भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement)

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भारत छोड़ो आन्दोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान  8 अगस्त 1942 को आरम्भ किया गया था। इस आन्दोलन का लक्ष्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करना था। महात्मा गांधी ने  यह आंदोलन अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुम्बई अधिवेशन में शुरू किया गया था। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए 4 जुलाई, 1942 को एक प्रस्‍ताव पारित किया था।  इस प्रस्‍ताव को लेकर शुरूवात में पार्टी में काफी मतभेद थे। इसी के चलते सी राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। मगर जवाहर  लाल नेहरू और मौलाना आजाद ने  अंत तक इसका समर्थन करने का  फैसला किया।भारत में ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति,भारत में स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए  इस प्रस्ताव को घोषित किया गया था।इस आन्दोलन को अगस्त क्रांति भी बोला जाता है।

क्रिप्स मिशन –

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान  ब्रिटिश फ़ौज दक्षिण-पूर्व एशिया में हार होने लगी थी।उस समय जापान भारत पर हमला कर ही देगा यह भी निश्चित माना जाने लगा था।इस संकट की घड़ी में ब्रिटेन भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए पहल करें इसके लिए अमेरिका, रूस व चीन ब्रिटेन पर लगातार दबाव डाल रहे थे। अपने इसी उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए  स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स  मार्च, 1942 ई. में भारत आये। इस मिशन का मुख्य उद्द्देश्य यह था की प्रमुख भारतीय नेताओं, मुख्यतः कांग्रेस व मुस्लिम लीग के नेताओं के सहयोग से युद्ध काल में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करना था। इसके बदले में क्रिप्स ने युद्ध की समाप्ति के बाद भारत में चुनाव कराने व उपनिवेशिक दर्जा प्रदान करने वादा किया,क्रिप्स के इस प्रस्ताव के  तात्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल एकदम विरुद्ध थे। ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण तरह से स्वतंत्र नहीं करना चाहती थी।ब्रिटिश सरकार ये कहती थी की भारत की सुरक्षा उन्ही के हाथो में रहे। कांग्रेस व् मुस्लिम लीग दोनों  ने क्रिप्स मिशन के सारे प्रस्तावों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया। महात्मा गाँधी ने क्रिप्स प्रस्ताव को “दिवालिया बैंक के नाम आगामी तारीख का चेक” कहा क्रिप्स मिशन असफल होने के बाद कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ दिया था , जिसके चलते कांग्रेस के बड़े सभी नेताओ को जेल में दाल दिया गया था।

महात्मा गाँधी का नारा ‘करो या मरो’-

क्रिप्स मिशन के  विफल होने के बाद  ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ महात्मा गाँधी ने अपना  तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया। इस आन्दोलन के छेड़ते ही महात्मा गाँधी को फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया था।देश के  युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फ़ोड़  के जरिए आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे। 8 अगस्त 1942 को प्रस्ताव के पारित होने के बाद महात्मा गाँधी ने कहा की एक छोटा सा मन्त्र है जो मै आप सभी को देना चाहता हू। उसके बाद महात्मा गाँधी  ने “करो या मरो” का नारा  दिया । इसके बाद भारत छोड़ो आन्दोलन के वक़त ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ प्रमुख नारे बन गये थे।

भारत छोड़ो आन्दोलन के शुरू होते ही कांग्रेस पर प्रतिबंध-

कांग्रेस के अधिकांश नेताओं को 9 अगस्त 1942 की सुबह ही गिरफ्तार कर लिए गया। उन्हें देश के अलग-अलग जेलों में डाल दिया गया । कांग्रेस पर भी  प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।देश के हर भाग में हड़तालों और प्रदर्शनों की संख्या और ज्यदा बढ गयी थी। सरकार ने पुरे देश में आन्दोलन के खिलाफ गोलीबारी, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां की।  लोगों ने सरकारी  संपत्तियों को नुक्सान पहुचना शुरू कर दिया था । लोगो ने  रेलवे की पटरियों को उखाड़ दिया था तथा  डाक व तार की  व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया था। कई जगहों पर जनता और पुलिस के बीच में झड़प हुई ।आन्दोलन से सम्बंधित समाचारों के प्रकाशित होने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। कई समाचारपत्रों ने इन प्रतिबंधों को मानने से मना क्र दिया था और स्वयं बंद करना ही बेहतर समझा। 1942 के अंत तक करीब 940 लोग मारे गए और लगभग 60,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया।इसी आन्दोलन के चलते 1630 लोग  घायल भी हुए थे। जिन लोगो की हत्या की गयी उनमे  महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।

ब्रिटिश साम्राज्य ने मानी हार-

ब्रिटिश साम्राज्य के दस्तावेजों के अनुसार अगस्त 1942 से दिसंबर 1942 तक पुलिस और सेना ने प्रदर्शनकारियों पर 538 बार गोलियां चलाईं। 1943 के अंत तक ब्रिटिश सरकार ने संकेत दे दिया कि सत्ता बदल  कर उसे भारतीयों के हाथ में सौंप दिया जाएगा। इसके बाद महात्मा गाँधी ने अपने आन्दोलन वापिस ले लिया था और आन्दोलन वापिस लेने के बाद कांग्रेसी नेताओं सहित लगभग 100,000 राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया था ।