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नायक यदुनाथ सिंह (Naik Jadunath Singh)

  • मूल नाम -यदुनाथ सिंह
  • पिता – बीरबल सिंह
  • माता – जमुना कंवर
  • जन्म – 21 नवंबर 1916
  • उपाधि – नायक
  • देहांत – 6 फरवरी 1948 (उम्र 31)

यदुनाथ सिंह का जीवन परिचय-

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में  के गाँव खजूरी 21 नवंबर 1916 को नायक यदुनाथ सिंह का जन्म हुआ था।पिता बीरबल सिंह राठौर किसान थे।माता जमुना कुंवर थी। यदुनाथ सिंह 8 भाई-बहन थे। यह 8 भाई और 1 बहन में तीसरे थे।

यदुनाथ सिंह ने अपने गांव के स्थानीय स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की।बड़ा परिवार होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति के अच्छी नहीं थी।जिसके कारण वे अपनी शिक्षा को आगे नहीं बढ़ा सके।बचपन से ही उनका अधिकांश समय अपने खेत में कृषि कार्य में व्यतीत होता था।यदुनाथ सिंह को खेल-कूद का बड़ा चस्का था। कुश्ती  के बड़े सौकीन थे और अपने गांव के कुश्ती चैंपियन थे। यदुनाथ सिंह ने शादी नहीं की थी उनके इसी चरित्र और कल्याण के लिए, उन्हें “हनुमान भक्त” नाम से जाना जाता था।

यदुनाथ सिंह का सैन्य जीवन-

21 नवंबर 1941 को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान,यदुनाथ सिंह को फतेहगढ़ रेजिमेंटल सेंटर में ब्रिटिश भारतीय सेना के 7वें राजपूत रेजिमेंट में भर्ती किया गया था। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद यदुनाथ सिंह को रेजिमेंट के प्रथम बटालियन में तैनात किया गया था।यदुनाथ सिंह महज 25 साल की उम्र सेना में भर्ती हुए थे।1942 में बटालियन को बर्मा अभियान के लिए अराकन प्रांत में तैनात किया गया था।अराकन अभियान के दौरान अराकन प्रांत में उन्होंने जापान के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

भारत-पाकिस्तान युद्ध-

अक्टूबर 1947 में जम्मू और कश्मीर में कब्जा करने के लिए पाकिस्तानी हमलावरों द्वारा एक आक्रमण किया गया।जिसके बाद भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सेना को प्रतिक्रिया देने का निर्देश दिये। जब महाराजा हरि सिंह पूर्ण रूप से कश्मीर को भारत के साथ विलय करने को तैयार हो गये तो भारतीय सरकार उनकी मदद को तयार हो गयी।जम्मू कश्मीर के कई स्थानों पर पाकिस्तानियो ने एक साथ हमला किया था।24 दिसंबर 1947 में हमलावरों ने झांगर क्षेत्र में कब्ज़ा कर लिया।एक जॉइंट ऑपरेशन चलाया गया जिसमे 50 वीं पैरा ब्रिगेड और राजपूत रेजिमेंट साथ में थी।नौशेरा सेक्टर को सुरक्षित रखने के लिए ये जॉइंट ऑपरेशन चलाया गया था।नौशेरा सेक्टर का टैनधार मोर्चा घुसपैठियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। इसी क्षेत्र में श्रीनगर एयरबेस था जिसमे नियंत्रण को आसानी से संभाला जा सकता था।दुश्मन नौशेरा में कब्जा करने की कोशिश में था।यदि नौशेरा में पाकिस्तानियों का कब्ज़ा हो जाता तो पुरे कश्मीर पर नियंत्रण हो जाता। 1 फ़रवरी 1948 को भारतीय सेना की 50वीं पैरा ब्रिगेड के कमांडिंग ऑफिसर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने होने वाले हमले का मुकाबला करने के लिए टुकड़ी को छोटे समूहों में सैनिकों को तैनात किया गया था।

नौशेरा के उत्तर में स्थित टेंढर जिसकी जिम्मेदारी यदुनाथ सिंह की बटालियन की थी। पाकिस्तानियों ने टेंढर चौकियों पर 6 फरवरी 1948 की सुबह 6:40 बजे हमला कर दिया। पाकिस्तानी सैनिकों को अंधेरे और धुंध का मदद मिली। पाकिस्तानी सैनिक बड़ी संख्या में टेंढर पर तैनात भारतीय सैनिकों की ओर बढ़ रहे थे।

टेंढर में यदुनाथ सिंह नौ जवानों की एक टुकड़ी की कमान संभाले थे।यदुनाथ सिंह और उनकी टुकड़ी ने पाकिस्तानियों के के कब्जे करने के तीन प्रयासों को विफल करने में सक्षम रहे थे।तीसरे हमले के दौरान यदुनाथ सिंह के सभी साथी घायल हो चुके थे।ऐसे में फिर भी यदुनाथ सिंह आगे बढ़ते रहे और दुश्मनों से अकेले ही लड़ते रहे।लड़ते हुए दुश्मनों की दो गोलिया यदुनाथ सिंह को लग गयी।एक गोली सीने में तथा दूसरी गोली इनके सिर में आ लगी।6 फ़रवरी 1948 को यदुनाथ सिंह दुश्मनों से लोहा लेते हुए रणभूमि में शहीद हो गये।

यदुनाथ सिंह उस टुकड़ी के कमांडर थे। घायल होने के बाद भी वह अपने जवानों को प्रेरित करते रहे।टेंढर को मजबूत करने के लिए ब्रिगेडियर उस्मान ने तीसरी पैरा बटालियन, राजपूत रेजिमेंट की एक कंपनी को टेंढर भेजा गया।यदुनाथ सिंह व् उनकी टुकड़ी द्वारा यदि पाकिस्तानी सैनिकों को नहीं रोका होता तो इन स्थानों पर दुबारा कब्जा करना बहुत मुस्किल हो जाता।

परमवीर चक्र-

टेंढर की लड़ाई  में वीरगति को प्राप्त हुए यदुनाथ सिंह को उनकी कुशल नेतृत्व व निडरता के चलते भारत सरकार ने वर्ष 1950 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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