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History of Rajasthan (Sisodia Dynasty of Mewar – Part I)

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राजस्थान का इतिहास (मेवाड़ का सिसोदिया वंश – भाग I)


History of Rajasthan (Sisodia Dynasty of Mewar – Part I)


चित्तौड़गढ़ के प्रथम साके में लक्षमण देव सिसोदिया के सात पुत्रों में से 6 पुत्र मारे गये सातवें पुत्र अरिसिंह के पुत्र राणा हम्मीर ने सिसोदिया वंश की नींव रखी थी। राणा हम्मीर ने 1326 ई.  में सिसोदिया वंश की नींव रखी थी।

खिज्र खां चित्तौड़गढ़ को छोड़ दिल्ली चला जाता गया था। अब चित्तौड़गढ़ पर मालदेव सोनगरा (मुछला मालदेव) का शासन था। मालदेव सोनगरा (मुछला मालदेव) की एक विधवा पुत्री थी जिनका नाम सोगरी रानी था। राणा हम्मीर ने मालदेव की पुत्री से विवाह किया था। राणा हम्मीर ने राजा मालदेव व राजा जैसा को पराजित कर सिसोदिया वंश की नींव रखी थी।

राणा हम्मीर (1326-64 ई.) – 

  • 1326 ई. में राणा हम्मीर ने सिसोदिया वंश की नींव रखी थी।
  • राणा हम्मीर को मेवाड़ का उद्दारक कहा जाता है।
  • कुम्वीभा द्रवारा रचित रसिक प्रिया में  राणा हम्मीर को वीर राजा कहा गया है।
  • कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में विषमघाटी पंचानन कहा गया है। (विषमघाटी पंचानन का अर्थ – युद्ध में सिंह के समान)
  • राणा हम्मीर ने चित्तौड़ में बाण माता मंदिर का निर्माण कराया था।
  • राणा हम्मीर के समय सिंगोली का युद्ध हुआ था। इस युद्ध में राणा हम्मीर ने मुहम्मद बिन तुग़लक़ को पराजित किया था।
  • दशरथ शर्मा ने राणा हम्मीर के लिए कहा था – तुर्कों की परतंत्रता का जूता उतार फेका।
  • कर्नल जेम्स टांड ने राणा हम्मीर को प्रबल हिन्दू राजा कहा था।

राणा क्षेत्रसिंह (राणा खेता) (1364-82 ई.) – 

  • राणा खेता राणा हम्मीर के पुत्र थे
  • राणा खेता के समय मेवाड़ मालवा संघर्ष प्रारंभ हुआ था। राणा खेता ने दिलावर खां गौरी पर आक्रमण किया था।
  • राणा खेता ने बुंदी के लाल सिंह पर आक्रमण किया और इसी आक्रमण में युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये।
  • राणा खेता के समय “अहेरिया उत्सव” मनाया गया था।

राणा लक्षसिंह (राणा लाखा) (1382-1421 ई.) –

  • राणा लाखा ने तारागढ़ बुंदी पर हालमा किया था।
  • राणा लाखा ने नकली तारागढ़ दुर्ग का किला जीता था। (राणा लाखा असली तारागढ़ दुर्ग नहीं जीत पाए थे तब उन्होंने प्रतिज्ञा ली की जब तक तारागढ़ दुर्ग नहीं जीत जाता तब तक अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं करूंगा।)
  • नकली तारागढ़ दुर्ग मिट्टी से बनाया गया था। इस दुर्ग की रक्षा करते हुए हाड़ा कुम्भा मारे जाते है।
  • राजदरबार में पंक्तिद्ध बैठना “मिसल” कहलाता है।
  • रणमल अपनी बहन के विवाह का प्रस्ताव राणा लाखा के पुत्र कुँवर चूड़ा के लिए भेजते है, परन्तु कुँवर चूड़ा ने विवाह के लिए मना कर दिया था।
  • कुँवर चूड़ा को मेवाड़ का भीष्मपितामाह कहा जाता है।
  • राणा लाखा का विवाह 62 वर्ष की उम्र में मारवाड़ के शासक  राव चूँड़ा राठौड़ की पुत्री व रणमल की बहन 20 वर्षीय हंसा बाई के साथ हुआ था।
  • राणा लाखा व हंसा बाई से उत्पन्न संतान को बाद में मेवाड़ का शासक बनाया जाता है।
  • 1387 ई. में राणा लाखा के समय छितरमल बंजारे ने अपने बैल की याद में पिछौला झील का निर्माण कराया था। पिछौला झील में जगनिवास महल, जगमंदिर व इसके पास में नटनी का चबूतरा बना हुआ है।
  • राणा लाखा के समय में जावर खान की ख़ोज हुई थी।
  • ‘झोटिंग भट्ट‘ एवं ‘धनेश्वर भट्ट‘ विद्वान पंडितों को राणा द्वारा राज्याश्रय दिया गया था।
  • कुँवर चूड़ा मेवाड़ को छोड़ मांडू के सुलतान होशांगशाह के पास चले जाते है।

राणा मोकल (1421-1433 ई.) –

  • राणा मोकल की माँ हंसा बाई अपने पुत्र की रक्षा के लिए अपने भाई रणमल को बुलाती है।
  • रणमल मेवाड़ी सरदार राघवदेव की हत्या कर देता है।
  • 1423 ई. में त्रिभुवन नारायण मंदिर का पुनः निर्माण कराया था। इसी मंदिर को समिदेश्वर भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण परमार राजा भोज ने कराया था।
  • राणा मोकल ने 1428 ई. में नागौर के फ़िरोज खां को रामपुरा के युद्ध में हराया था।
  • 1433 ई. में अहमद शाह को हरया था।
  • राणा मोकल के दरबारी कवी योगेश्वर व विष्णु भट्ट थे।
  • राणा मोकल ने तुलादान की परम्परा शुरू की थी।
  • राणा खेता की पासवान के पुत्र चाचा और मेरा ने 1433 ई. में राणा मोकल की हत्या कर दी थी।

महाराणा कुम्भा या कुम्भकर्ण (1433-68 ई.) –

  • महाराणा कुम्भा का जन्म 1403 ई. में चित्तौड दुर्ग में हुआ था।
  • महाराणा कुम्भा राणा मोकल के पुत्र थे।
  • महाराणा कुम्भा की माता सौभाग्य देवी थी।
  • महाराणा कुम्भा को राजस्थान में कला व स्थापक कला का जनक कहा जाता है।
  • कुम्भा ने मेवाड़ में 84 गिरी दुर्गों का निर्माण करवाया था।
  • भारत में सर्वाधिक दुर्ग महाराणा कुम्भा चाचा और मेरा की हत्या करवा अपने पिता की मृत्यु का बदला लेते है।
  • महाराणा कुम्भा चित्तौड़गढ़ दुर्ग में रणमल की हत्या करवाकर मेवाड़ी सरदार की मृत्यु का बदला लेते है।

महाराणा कुम्भा की उपाधियाँ – 

  1. हालगुरु – गिरी दुर्गों का स्वामी के कारण
  2. दान गुरु – दान शीलता के कारण
  3. छाप गुरु – छापामार युद्ध पद्धति में निपुण
  4. चाप गुरु – धनुर विद्या में निपुण
  5. हिन्दु सुरताण – मुस्लिम शासकों द्वारा (मुस्लिम शासकों को हराने पर)
  6. तोडरमल – संगीत की तीनों तालों में निपुण
  7. नन्द नन्दीश्वर – शैव धर्म का उपासक
  8. महाराजाधिराज – राजाओं का रजा
  9. राणा रासो – विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण
  10. अभिनव भारताचार्य – संगीत के क्षेत्र में विपुल ज्ञान के कारण।
  11. परम गुरु – राजाओं में श्रेष्ठ
  12. राज गुरु – राजाओं को शिक्षा देने की क्षमता होने के कारण कहलाये।
  13. धीमान-बुद्धिमत्तापूर्वक निर्माणादि कार्य करने से
  14. शैलगुरु-शस्त्र या भाला का उपयोग सिखाने से।
  15. नाटकराज कर्ता – नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण
  16. नंदिकेश्वरावतार-नंदिकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण।
  17. अश्पति
  18. गजपति
  19. नव्य भारत
  20. निर्भय
  21. रायरायां

कुम्भा के अभियान –

  • कुम्भा का प्रथम अभियान माउंट आबू के शासकों पर हुआ था।
  • 1437 ई. में सारंगपुर का युद्ध हुआ था। इसे मालवा का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में महमूद खिलजी प्रथम को पराजित किया था।
  • इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद विजयस्तम्भ का निर्माण करवया था। यह विजयस्तम्भ चित्तौड़ दुर्ग में बनवाया था।
  • 1453 में आवड़- बावड़ की संधि हुई थी। यह संधि राणा कुम्भा व राव जोधा के मध्य होती है। इस संधि में राणा कुम्भा के पुत्र रावमल व राव जोधा की पुत्री श्रृंगारी देवी का विवाह हो जाता है।
  • श्रृंगारी देवी एक घोसुण्डी बावड़ी बनवाती है। यही से राजस्थान में वैष्णव धर्म की जानकारी प्राप्त होती है।
  • आवड़- बावड़ संधि का केंद्र बिंदु सोजत (पाली) था।
  • आवड़- बावड़ की संधि का मुख्य कारण मारवाड़ – मेवाड़ सीमा का निर्धारण तय करना था। यह संधि हंसा बाई के कारण होती है।
  • 1456 में चम्पानेर की संधि हुई थी। यह संदी राणा कुम्भा के विरुद्ध कुतुबुद्दीन शाह (गुजरात) व मालवा के महमूद खिलजी प्रथम के मध्य होती है।
  • राणा कुम्भा इस संदी को असफल कर देते है।
  • 1457 ई. में बदनौर (भीलवाड़ा) के युद्ध में राणा कुम्भा इन्हें पराजित कर देते है।  (कुशाल माता का मंदिर बदनौर में है।)

विजय स्तम्भ – 

  • राणा कुम्भा ने 1440 – 48 के मध्य विजय स्तम्भ बनवाया था।
  • विजय स्तम्भ नौ मंजिला ईमारत है।
  • यह स्तम्भ 122 फीट ऊँचा है।
  • इस स्तम्भ में 157 सीढीया है।
  • 15 अगस्त, 1949 को राजस्थान का प्रथम 1 रु. का डाक टिकट जारी किया गया था। (यह विजय स्तम्भ राजस्थान पुलिस , माध्यमिक शिक्षा बोर्ड व जे. के. सीमेंट का प्रतिक चिन्ह है।)
  • विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता व उसके पुत्र नापा, पोमा व पूंजा थे।
  • विजय स्तम्भ चक्रवाप पद्धति पर बना हुआ है।
  • विजय स्तम्भ पर कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति अत्रि पुत्र महेश ने लिखी थी।
  • विजय स्तम्भ की तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बार ‘अल्लाह‘ लिखा हुआ है।
  • विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता , नापा, पोमा व पूंजा थे।
  • फर्ग्युसन ने रोम के टार्जन टावर से तुलना की है।
  • उपेन्द्रनाथ डे ने विष्णु ध्वज / विष्णु स्तम्भ कहा है।
  • हर्मन गोइट्स ने भारतीय मूर्ति कला का विश्व कोष कहा है।
  • विजय स्तम्भ भगवान विष्णु को सर्मपित ईमारत है।
  • इसका पुनः निर्माण महाराणा स्वरूप सिंह ने कराया था।
  • कर्नल जेम्स टांड ने विजय स्तम्भ को क़ुतुबमीनार से श्रेष्ठ ईमारत बताया है।
  • ओझा ने इस स्तम्भ को पौराणिक देवी-देवताओं का अमूल्य कोष कहा है।

कुम्भलगढ़ दुर्ग – 

  • कुम्भलगढ़ दुर्ग राणा कुम्भा की पत्नी कुम्भल देवी की याद में बनाया गया था।
  • कुम्भलगढ़ अभयारण्य
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग राजसमन्द जिले में बना हुआ है।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग के शिल्पी मंडन की देख-रेख में बनवाया गया है।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग मेवाड़ का आत्मनिर्भर दुर्ग है।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग को महिच्छन्द्रपुर दुर्ग भी कहा जाता है।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग की दीवार 36 की.मी. मोटी है। इस दीवार को भारत की महान दीवार (ग्रेट वाल ऑफ़ इंडिया) भी कहा जाता है।
  • इस दीवार पर 3-4 घोड़े एक साथ दौड़ाए जा सकते है।
  • मेवाड़ के आँख कटारगढ़ को कहा जाता था। कटारगढ़ राणा कुम्भा का निवास स्थान था।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग में पृथ्वीराज सिसोदिया की छतरी बनी हुई है।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग हठी नाल दर्रे पर बना हुआ है।
  • अबुल फजल ने कहा दुर्ग को निचे से उप्पेर देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।
  • कर्नल जेम्स टांड ने इस दुर्ग की तुलना एटुस्कन से की है।
  • इस दुर्ग को मेवाड़ शासकों की शरण स्थली कहा जाता है।
  • इस दुर्ग को बैरों का दुर्ग कहा जाता है।
  • यह दुर्ग 1443-59 के मध्य बनाया गया था।

राणा कुम्भा के समय रणकपुर के जैन मंदिरों का निर्माण हुआ था। यह मंदिर सेठ धरण शाह ने बनवाए थे। इन मदिरों के शिल्पी देपाक थे। यह मंदिर मथाई नदी किनारे पर है। इन मंदिरों को 1444 खम्भों का घर कहा जाता है।

नलिनीविल्स विमान मंदिर भी कहा जाता है। चौमुखा जैन मंदिर भी कहा जाता है। इन मंदिरों को स्तम्भों, वनों का मंदिर कहा जाता है। इन मंदिरों के अंदर एक मंदिर पार्श्वनाथ मंदिर बना हुआ है जिसे वेश्याओं / गणिकाओं का मंदिर भी कहा जाता है।

राणा कुम्भा के ग्रन्थ – 

  • राणा कुम्सभा का सबसे बड़ा ग्रन्थ संगीतराज है। यह 5 भागों में विभक्त है।
  1. पाठ्य रत्न कोष
  2. गीत रत्न कोष
  3. वाद्य रत्न कोष
  4. नृत्य रत्न कोष
  5. रस रत्न कोष
  • कामराज रतिसार
  • चंडी शतक 
  • संगीत मीमांसा
  • संगीत सार
  • सुढ़ प्रबंध
  • रसिक प्रिया (यह जयदेव की गीत गोविन्द पर टिका थी)
  • एकलिंग महात्म्य का प्रथम भाग राजवर्णन राणा कुम्भा ने लिखा है।

कुम्भा की पुत्री “रमा बाई” जिन्हें वागेश्वरी (सरस्वती) की उपाधि मिली थी। रमा बाई भी संगीत की विदुषी महिला थी।

  • राणा कुम्भा के दरबारी कवी ने कान्हा व्यास ने एकलिंग महात्म्य लिखा है।
  • राणा कुम्भा के दरबारी संगीत गुरु सारंग व्यास थे।
  • दरबारी चित्र कला गुरु हीरानन्द थे। इन्होने “सुपास नाह चरियम” चित्र बनाया था। मेवाड़ चित्रकला का सबसे बड़ा चित्रित ग्रन्थ।
  • शिप्ली मंडन के भाई ने नाथा ने “वास्तुमंजरी” ग्रन्थ लिखा है।
  • मंडन के पुत्र ने गोविन्द ने कलानिधि, द्वार दीपिका, उद्धार धारिणी ग्रन्थ लिखे है।
  • मंडन ने निम्न ग्रन्थ लिखे थे – 
  1. राजवल्लभ (इस ग्रंथ में नागरिकों के आवासीय गृहों, राजप्रासाद एवं नगर रचना का विस्तृत वर्णन है।)
  2. कोदंडमंडन (यह धनुविद्या से सम्बंधित है)
  3. प्रासाद मंडन (यह देवालय से सम्बंधित है)
  4. रूप मंडन (यह मूर्तिकला से सम्बंधित है)
  5. देवमूर्ति प्रकरण ( मूर्ति निर्माण और प्रतिमा स्थापना के साथ ही प्रयुक्त होने वाले विभिन्न उपकरणों का विवरण इस ग्रन्थ में दिया गया है।
  6. वास्तु मंडन  (इस ग्रन्थ में वास्तुकला का सविस्तार वर्णन है।)
  7. वास्तुसार (यह ग्रन्थ वास्तुकला संबंधी दुर्ग, भवन और नगर निर्माण संबंधी वर्णन है।)
  8. शकुन मंडन (इस ग्रन्थ में शगुन और अपशगुनों का वर्णन है।)
  9. वैद्य मंडन (इस ग्रन्थ में विभिन्न व्याधियों के लक्षण और उनके निदान के उपाय बताए गए हैं।)
  • राणा कुम्भा के दरबार में महेश भट्ट, तिला भट्ट आदि थे।
  • राणा कुम्भा की हत्या इन्ही के पुत्र उदा (उदयकरण) द्वारा 1468 ई. में की गयी थी। इनकी हत्या कटारगढ़ (कुम्भलगढ़) के मामदेव मंदिर के समीप की गयी थी।
  • उदयकरण को मेवाड़ का पित्रहंता कहा जाता है।
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