राजस्थान का इतिहास (राठौर वंश) भाग -1

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राजस्थान का इतिहास (राठौर वंश) भाग -1)

History of Rajasthan (Rathore Dynasty Part -1)

मारवाड़ का राठौर वंश


डॉ गोपीनाथ शर्मा के अनुसार राठौर शब्द राष्ट्रकोट से बना है। राष्ट्रकोट दक्षिण भारत का एक राजवंश था। कर्नल जेम्स टांड ने राठौरों की वंशावली के आधार पैर इन्हें सूर्यवंशी बताया था।

कर्नल जेम्स टांड  के अनुसार राठौरों को दयालदास ने सूर्यवंशी बताया था। मुहणोत नैणसी ने जयचंद गहडवाल का वंशज बताया है।

राठौर राजवंश के संस्थापक 

राव सीहा (1240 – 1273 ई.) – 

  • राव सिंहा कन्नोज के राजा जयचंद गहडवाल के पौत्र थे। जयचंद गहडवाल की पुत्री संयोगिता का विवाह पृथ्वीराज III के साथ हुआ था।
  • राजा जयचंद गहडवाल के समय 1194 को कन्नोज पर मुहम्मद ग़ौरी ने आक्रमण कर दिया था। यह चन्दावर का युद्ध हुआ था। इस समय राव सिंहा बदायू के सूबेदार थे।
  • इस युद्ध के पश्चात 1212 में राव सिंहा बदायू से मारवाड़ (पाली) चले गये थे। राव सिंहा ने अपना केंद्र खेड़ नाम स्थान को बनाया था।
  • राव सिंहा का विवाह सोलंकी सरदार की पुत्री पार्वती सोलंकी के साथ हुआ था।
  • राव सिंहा की मृत्यु बीठू गाँव (पाली) में गायों की रक्षा करते हुए होती है।
  • राव सिंहा ने 1273 में राठौर वंश की नीव रखी थी। राठौरों के आदि पुरुष / मूल पुरुष राव सिंहा  है।
  • राठौर राजवंश के संस्थापक राव सिंहा थे। राठौर राजवंश बीकानेर से बाड़मेर व बाड़मेर से किशनगढ़ तक फैला हुआ था।

मारवाड़ के राठौर वंश के प्रमुख शासक – 

राव आसनाथ – 

  • राव आसनाथ की अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुए युद्ध में हार हुई थी।
  • राव आसनाथ ने गुन्दोज नामक स्थान को अपना केंद्र बनाया था।

राव धुहड़ –

  • राव धुहड़ कर्नाटक गये थे तथा वहाँ से नागणेची माता की कास्ट प्रतिमा लाकर नगाड़ा गाँव में स्थापित करवाई थी।

Note – कनाणा गाँव (बाड़मेर) का गैर नृत्य प्रसिद्ध है।

राव चुंडा (1383 – 1423 ई.) – 

  • 1395 में राव चूडा ने मण्डोर को अपनी राजधानी बनाया था। मण्डोर का प्राचीन नाम मांडव्यपुर था। मांडव्यपुरकी स्थापना 6 वी शताब्दी में हरीश चन्द्र द्वारा की गयी थी। हरीश चन्द्र गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के शासक थे।
  • राव चूडा को राठौर वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
  • राव चूडा ने सामंत प्रथा की शुरुवात की थी।
  • मण्डोर में रावण का मंदिर है। रावण की पत्नी मंदोदरी यही की रहने वाली थी। रावण की ईष्ट देवी खरारना देवी है।
  • मण्डोर में 33 करोड़ देवी – देवताओं की साल है।
  • राव चूडा ने इन्दाशाखा के राजा उगम सिंह की पुत्री किशोरी देवी के साथ विवाह किया था। राव चूडा को मण्डोर दहेज़ में मिला था।
  • राव चूडा की तुलना शिवाजी से की जाती है।
  • राव चूडा वीरमदेव के पुत्र थे।
  • राव चूडा ने अपनी पत्नी किशोरी देवी के कहने पर कान्हा को उत्तराधिकारी बना दिया था। कान्हा को उत्तराधिकारी नियुक्त किये जाने से रणमल नाराज होकर मेवाड़ चले जाते है।

राव रणमल (1427 – 1438) – 

  • राव रणमल ने अपना अधिकांश समय मेवाड़ में बिताया था।
  • राव रणमल की पत्नी कोडम दे थी। कोडम दे ने कोडमदेसर बावड़ी बनवाई थी।
  • मेवाड़ के शासक राणा लाखा थे। राणा लाखा के पुत्र कुंवर चुंडा थे।
  • राव रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई के विवाह का प्रताव कुंवर चुंडा के लिए भेजा था परन्तु दूत की गलतफ़हमी के चलते दूत ने प्रताव राणा लाखा को बोल दिया। राणा लाखा ने इस विवाह के लिए मना कर दिया था।
  • राव रणमल फिर स्वंय राणा लाखा के पास गये और बोले मैं अपनी बहन का विवाह आपसे करा दूंगा परन्तु आपसे और मेरी बहन से उत्पन्न संतान ही मेवाड़ का अगला उत्तराधिकारी बने।
  • राजपूतों में बेटी के विवाह के अवसर पर जो अन्य कुछ स्त्रियाँ भेजी जाती थी उन्हें दासी कहा जाता था। इस प्रथा को डाबरिया प्रथा कहा जाता था।
  • कुंवर चुंडा विवाह करने से मना कर देते है। कुंवर चुंडा को मेवाड़ का भीष्म पितामह कहा जाता है।
  • हंसा बाई और राणा लाखा से उत्पन्न संतान का नाम राणा मोकल था।
  • राणा लाखा ने राव रणमल को मेवाड़ में धणला नामक जागीर दी थी।
  • राव रणमल को मारवाड़ में जोजावर की जागीर दी गयी थी।
  • राव रणमल मेवाड़ी सरदार राघव देव की हत्या करवा देते है।
  • राणा मोकल के पुत्र का नाम कुम्भा था। कुम्भा ने हंसाबाई की दासी भारमली की सहायता से 1438 में चित्तौड़ दुर्ग में राव रणमल की हत्या करवा दी थी।

राव जोधा (1438 – 1489) – 

  • कुम्भा के द्वारा हुए आक्रमण के कारण राव जोधा भाग कर काहुनी गाँव चले जाते है।
  • राव जोधा काहुनी गाँव में लोकदेवता हड़बूजी से आशीर्वाद लेते है। हड़बूजी शकुन शास्त्र के ज्ञाता थे। हड़बूजी को वचन सिद्ध पुरुष , राम देव जी के मौसेरे भाई कहा जाता है। हड़बूजी का वाहन शियार है।
  • हड़बूजी का जन्म बुन्देल (नागौर) में हुआ था। हड़बूजी का मंदिर जोधपुर के बेंगटी गांव में बना हुआ है। हड़बूजी के मंदिर में बैल गाड़ी की पूजा होती है। मंदिर का निर्माण जोधपुर के शासक अजीत सिंह ने करवाया था।
  • राव जोधा को अपना साम्राज्य वापिस मिलने के पश्चात राव जोधा ने तलवार ग्रहण की तथा हड़बूजी को बेंगटी गांव सौपा था।
  • राव जोधा ने अक्का सिसोदिया व अहाडा के सहयोग ने मण्डोर पुनः प्राप्त किया था।
  • 1453 में राव जोधा व महाराणा कुम्भा के मध्य आवल – बावल की संधि हुई थी। आवल – बावल की संधि का प्रमुख केंद्र बिंदु सोजत (पाली) था।
  • आवल – बावल संधि के तहत राव जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगारीदेवी का विवाह महाराणा कुम्भा पुत्र रायमल के साथ किया था। श्रृंगारी देवी ने घोसुण्डी बावड़ी बनायी थी।
  • राजस्थान में सर्वप्रथम वैष्णव धर्म की जानकारी घोसुण्डी बावड़ी से ही मिलती है।
  • 12 मई 1459 को राव जोधा ने जोधपुर शहर बसाया था तथा जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया था। (जोधपुर को नीला शहर , सूर्य नगरी , ससांस्कृतिक विरासत का शहर, मारवाड़ की राजधानी या मरुस्थल का प्रवेश द्वार, जोधाणा, सनसिटी कहा जाता है।)
  • 1459 में राव जोधा ने मेहरानगढ दुर्ग बनाया था। मेहरानगढ़ दुर्ग चिड़ियाटूक पहाड़ी पर स्थित है।
  • मेहरानगढ दुर्ग को गढ़ चिंतामणी , कागमुखी , सूर्यमुखी , मोर ध्वज, मयूर ध्वज कहा जाता है। मेहरानगढ दुर्ग मोर पंख की आकृति का है।
  • मेहरानगढ दुर्ग के भीतर नागणेची माता व चामुंडा माता का मंदिर स्थित है।
  • मेहरानगढ दुर्ग की नीव रिद्धि बाई (करणी माता) ने रखी थी। मेहरानगढ दुर्ग बनाते हुए राजाराम मेघवाल / रजिया जिन्दा चुनवा दिया गया था।
  • रुडयाड किपलिंग ने कहा है कि यह मेहरानगढ दुर्ग देवताओं व अपसराओं द्वारा निर्मित है।
  • कैनेडी ने मेहरानगढ दुर्ग को विश्व का आठंवा अजूबा कहा है।
  • राव जोधा ने सामंत प्रथा व नौकरशाही प्रथा को प्रमुखता से जोधपुर राज्य के अंदर चलाने का काम किया था।
  • राव जोधा की पत्नी जसमा दे ने रानीसर तालाब बनवाया था।
  • राव जोधा का राजतिलक इनके भाई अखेराज ने किया था। अखेराज ने अपना अंगूठा काटा और राव जोधा का राजतिलक किया था।
  • अखेराज के पास बागड़ी की जागीर थी। अखेराज की मृत्यु के बाद बागड़ी  के राजपूत सरदार जोधपुर शासकों का राजतिलक करते थे।
  • यह प्रथा महाराजा सरदार की मृत्यु के पश्चात समाप्त हो गयी थी।

राव सातल देव (1489 – 1492) – 

  • राव सात्तल देव ने जैसलमेर में सात्तलमेर बसाया था।
  • राव सात्तल देव के समय अजमेर के हाकिम मल्लू खां का सेनापति घुड़ले खां पीपाड़ में 140 अविविहित कन्यायों का अपहरण करता है, तो राव सात्तल देव युद्ध कारते हुए कोसाणा गाँव में वीरगति को प्राप्त होते है।
  • राव सात्तल देव ने घुड़ले खां को मार कर इन 140 कन्यायों को छुड़ाया था।
  • घुड़ले खां की पुत्री गिन्दोली ने मारवाड़ में घुड़़ला नृत्य की शुरुवात की थी।
  • घुड़़ला नृत्य चेत्र कृष्ण अष्टमी को अर्ध छिद्रित मटके में दीपक जला कर किया जाता है।
  • राव सात्तल देव की पत्नी फुला भटियानी थी। फुला भटियानी ने फुलेलाव तालाब बनाया था।
  • सात्तलमेर पोखरण की रजधानी थी।

राव गांगा (1515 – 1531) – 

  • राव गांगा ने ईडर के उत्तराधिकारी युद्ध में रायमल का साथ दिया था।
  • राव गांगा ने सांगा की सहायता हेतु 4000 सैनिक भेजे थे जिनका नेतृत्व इनके पुत्र मालदेव ने किया था।
  • 1529 – 30 में राव गांगा के शासन काल में सेवकी का युद्ध हुआ था। सेवकी का युद्ध राव गांगा और दौलत खां (नागौर के) के मध्य हुआ था
  • सेवकी के युद्ध में राव गांगा की ओर से राव जैतसी ने साथ दिया था।
  • दौलत खां की तरफ से शेखा ने भी युद्ध में भाग लिया था। शेखा ने ही शेखवाटी बसाया था।
  • सेवकी के युद्ध में राव गांगा की विजय होती है।

राव मालदेव (1532 – 1562) – 

  • राव गांगा  की हत्या इन्ही के पुत्र राव मालदेव ने की थी। राव मालदेव को मेवाड़ का प्रथम पितृहन्ता कहा जाता है।
  • राव मालदेव का राज्याभिषेक 5 जून 1531 को होता है परन्तु इनका काल 1532 से माना जाता है। राव मालदेव का राज्याभिषेक सोजत (पाली) में हुआ था।
  • राव मालदेव की माता माणिक देवी थी। माणिक देवी सिरोही के शासक जगमाल देवड़ा की पुत्री थी।
  • राव मालदेव को उदय सिंह ने बसन्तराय हाथी दिया था।
  • डॉ ओझा ने राव मालदेव को महत्वाकांक्षी शासक कहा था।
  • फ़ारसी इतिहासकारों ने राव मालदेव को हस्मथ वाला राजा कहा है।
  • बंदायूनी ने भारत का महान पुरुषार्थी राजकुमार कहा है।
  • फ़रिश्ता ने राव मालदेव को भारत का शक्तिशाली शासक बताया है।
  • राव मालदेव को 52 युद्धों का विजेता व चारण इतिहासकारों ने राव मालदेव हिन्दू बादशाह भी कहा है।
  • राव मालदेव के पास 58 परगने थे।
  • राव मालदेव का विवाह राव लूणकरण की पुत्री उमा दे के साथ हुआ था।
  • उमा दे को रूठी रानी के नाम से भी जाना जाता है। उमा दे आजीवन रूठ कर तारागढ़ (अजमेर) दुर्ग में रही थी।
  • राव मालदेव ने खानवा युद्ध का नेतृत्व किया था।
  • मारवाड़ में अधिकांश किले राव मालदेव ने ही बनवाए है।
  • राव मालदेव ने भाटी शासकों से फलौदी छिना था।
  • राव मालदेव ने सिवाणा के राठौर शासक डूंगर सिंह को पराजित किया था।
  • राव मालदेव ने सांचोर के चौहानों को हराया था।
  • राव मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव को हराया था।
  • मारवाड़ चित्रकला का उद्भव राव मालदेव  के समय हुआ था। मारवाड़ चित्रकला में पिला रंग व आम के वृक्षों का चित्रांकन किया गया है।
  • राव मालदेव के समय दिल्ली में हुमायूँ , गुजरात में बहादुर शाह व बिहार में शेरशाह सूरी (फरीद) था।
  • 1541 में पाहेवा/साहवा का युद्ध फलौसी (जोधपुर) में हुआ था। इस युद्ध में राव मालदेव ने अपने सेनापति जेता व कुम्पा को बीकानेर के राव जैतसी से युद्ध को भेजा था।
  • इस युद्ध में जैतसी की हत्या हो जाती है, जिसके बाद जैतसी का पुत्र कल्याणमल दिल्ली शेरशाह सूरी के पास सहायता के लिए जाता है।
  • कल्याणमल ने सबसे पहले नागराज को शेरशाह उरी के पास भेजा था।
  • यह युद्ध जितने के बाद राव मालदेव कुम्पा को डीडवाना व झुंझुनू की जागीर दी जाती है।
  • 5 जनवरी 1544 को गिरी सुमेल/जैतारण का युद्ध पाली में हुआ था।
  • इस युद्ध राव मालदेव के दोनों सेनापति जेता व कुम्पा तथा शेरशाह सूरी के मध्य हुआ था।
  • इस युद्ध में शेरशाह सूरी का सेनापति जलाल खां था। इस युद्ध में कल्याणमल ,मेड़ता के वीरमदेव ने शेरशाह का साथ दिया था।
  • इस युद्ध में शेरशाह सूरी विजयी रहता है। इस युद्ध में राव मालदेव के दोनों सेनापति जेता व कुम्पा की मृत्यु हो जाती है।
  • राव मालदेव भागकर सिवाणा दुर्ग (बाड़मेर) में चले जाते है। इस दुर्ग को मारवाड़ शासकों की शरण स्थली कहा जाता है।
  • इस युद्ध के बाद शेरशाह सूरी ने कहा था “मैं मुठ्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत गवा देता”। शेरशाह सूरी ने कहा था अगर मेरे पस जेता और कुम्पा जैसे सेनानायक होते तो ये हिदुस्तान ही नहीं ये विश्व मेरा होता।
  • शेरशाह सूरी इस युद्ध में रायसीन अभियान के बाद 80,000 सैनिकों के साथ आता है।
  • ख्वास खां व ईसा खां को शेरशाह सूरी ने जोधपुर आक्रमण के लिए भेजा था।
  • राव मालदेव को दो पुत्रियाँ थी। इनके एक पुत्री लाल बाई का विवाह इस्लाम शाह के हुआ था व कनक बाई का विवाह सुलतान महमूद के साथ हुआ था।
  • नागौर के दौलत खां से राव मालदेव ने दरियाजोश हाथी को लेकर युद्ध किया था।
  • 1557 में हरमाड़ा का युद्ध मालदेव एवं अजमेर के पठान सेना नायक हाजी खाँ के मध्य हुआ था।

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