राजस्थान का इतिहास (राठौर वंश) भाग -2

राजस्थान का इतिहास (राठौर वंश) भाग -2)


History of Rajasthan (Rathore Dynasty Part -2)


मारवाड़ का राठौर वंश


राव चंद्रसेन (1562 – 1581) – 

  • राव चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप , प्रताप का अग्रगामी , भुला बिसरा राजा , विस्मृत वाला राजा , प्रताप का पथ प्रदर्शक , द फॉरगेटन हीरों ऑफ मारवाड़ , राजपूत शासकों का आदर्श कहा जाता है।
  • राव चंद्रसेन छापामार युद्ध पद्धति अपनाने वाले दुसरे शासक थे। (पहले शासक उदय सिंह थे।)
  • राव चंद्रसेन  की माता का नाम स्वरूप दे था।
  • राव चंद्रसेन का जन्म जुलाई 1541 में हुआ था।
  • 3 नवम्बर 1570 को अहिच्छत्रपुर दुर्ग (नागौर) में शुक्र ताबल किनारे भारमल के कहने पर नागौर दरबार लगा था। (नागौर दरबार का मतलब राजस्थान के अधिकांश राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की थी।)
  • अकबर ने सुलुहकुल की नीति अपनायी थी।
  • राव चंद्रसेन के दो भाई रामसिंह व उदय सिंह भी इस नागौर दरबार में आते है। राव चंद्रसेन ने राम सिंह को नाडोल के युद्ध में पराजित किया था व उदय सिंह को लोहावट के युद्ध में पराजित किया था।
  • युद्ध में पराजित होने के बाद राम सिंह व उदय सिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
  • नागौर दरबार में बीकानेर से कल्याणमल भी आये थे। कल्याणमल के दो पुत्र थे, पृथ्वी राठौर (पीथल) व रायसिंह राठौर। अकबर ने पृथ्वी राठौर (पीथल) को गागरोण दुर्ग सौपा था।
  • पृथ्वी राठौर (पीथल) ने गागरोण दुर्ग में ही वेलि क्रिसन रुकमणी री लिखा था। वेलि क्रिसन रुकमणी री को उत्तरी मारवाड़ का प्रमुख ग्रन्थ कहा जाता है।
  • नागौर दरबार में जैसलमेर से हरराय भी आते है।
  • इस दरबार में चन्द्र सेन भी आये थे परन्तु राव चन्द्रसेन को यथोचित सम्मान नहीं मिला तो राव चन्द्र सेन वापिस जोधपुर चले गये थे।
  • राव चंद्रसेन के अकबर की अधीनता स्वीकार न करने पर अकबर क्रोधित हो जाता है तथा अपने एक व्यक्ति हुसैन कुली खां को भेजता है तथा उसरी बार रायसिंह राठौर को भेजता है।
  • रायसिंह राठौर को 1572 में अकबर द्वारा जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया गया था।
  • अकबर ने जोधपुर की भूमि को खालसा (राजकीय नियंत्रण वाली भूमि) घोषित किया गया था। (जोधपुर की भूमि को दो बार खालसा घोषित किया गया था एक बार अकबर द्वारा व दूसरी बार औरंगज़ेब द्वारा किया गया था।)
  • रायसिंह राठौर के जोधपुर पहुँचने के बाद राव चन्द्रसेन सिवाणा चले गये थे। सिवाणा में राव चंद्रसेन ने चार वर्षों तक मुगलों का विरोध किया था।
  • इसके पश्चात राव चंद्रसेन  सिवाणा से भाद्राजूण चले गये थे।
  • पोकरण का किला हरराय भाटी के पास गिरवी रख राव चंद्रसेन सारण की पहाड़ियों (छतरी)  में चले गये थे। सारण की पहाड़ियों के पश्चात राव चंद्रसेन कांगूजा की पहाड़ियां चले गये थे।
  • कांगूजा से सचियाप जाने के बाद 11 जनवरी 1581 को राव चंद्रसेन को बैरसल द्वारा जहर देकर हत्या कर दी थी।

Note – 1581 – 1583 तक यह क्षेत्र खालसा घोषित रहा था।

मोटा राजा उदय सिंह –  

  • उदय सिंह को अकबर द्वारा मोटा राजा की उपाधि दी गयी थी।
  • मुगलों के आने से मारवाड़ चित्रकला पर मुग़लशैली का प्रभाव मिलता है।
  • मोटा राजा उदय सिंह प्रथम मारवाड़ के राजा थे जिन्होंने मुगलों के साथ विवाहिक संबंध स्थापित किये थे।
  • मोटा राजा उदय सिंह ने अपनी पुत्री जगतगुसाई (जोधा बाई) का विवाह जहांगीर से किया था। जहांगीर प्रथम मुग़ल शासक था जिसकी माता (हरखा बाई) राजपूत रानी थी।
  • जगतगुसाई (जोधा बाई) व जहांगीर से उत्पन्न संतान शाहजहाँ  (खुर्रम) थी।
  • मोटा राजा उदय सिंह ने मल्लीनाथ मेले को प्रारंभ किया था। यह मेला चेत्र माह में तिलवाड़ा (बाड़मेर) में लूनी नदी के किनारे लगता है।
  • मोटा राजा उदय सिंह की मृत्यु लाहौर में हुई थी।

Note – रावी नदी का प्राचीन नाम पुरुषणी नदी था।

सूर सिंह – 

  • सूर सिंह का राज्याभिषेक लाहौर में हुआ था।
  • सूर सिंह को अकबर द्वारा सवाई की उपाधि दी गयी थी।
  • सूर सिंह ने जोधपुर में मोती महल का निर्माण करवाया था।
  • सूर सिंह की मृत्यु बुरहानपुर (दक्षिण भारत)  में हुई थी।

गज सिंह – 

  • गज सिंह का राज्याभिषेक बुरहानपुर में हुआ था।
  • गज सिंह ने घोड़ा दागने से मुक्त किया था।
  • जहांगीर ने गज सिंह को दालथम्बन की उपाधि प्रदान की थी।
  • गज सिंह के पुत्र अमर सिंह तथा जसवंत सिंह थे।
  • गज सिंह ने पासवान अनारा बेगम के कहने पर जसवंत सिंह को उत्ताराधिकारी घोषित किया था।

अमर सिंह – 

  • जसवंत सिंह को उत्ताराधिकारी घोषित करने के पश्चात अमर सिंह शाहजहाँ के पास चले जाते है। अमर सिंह को कटार का धनी कहा जाता है।
  • अमर सिंह की गाथाएं ख्यालों में प्रसिद्ध है। अमर सिंह के घोड़े के नाम बादल था।
  • अमर सिंह की छतरी नागौर में है।
  • 1644 में अमर सिंह तथा बीकानेर के कर्णसिंह के मध्य ‘मतीरे की राड़’ युद्ध हुआ था।
  • अमर सिंह ने शाहजहाँ के साले सलावत खां की हत्या कर दी थी।

जसवंत सिंह (1638 – 1678) – 

  • जसवंत सिंह का राज्याभिषेक पहले आगरा तथा बाद में जोधपुर में हुआ था।
  • जसवंत सिंह को महाराजा की उपाधि शाहजहाँ द्वारा दी गयी थी।
  • जसवंत सिंह का विवाह बूंदी के शासक शत्रुसाल की पुत्री जसवंत दे हाड़ी रानी से हुआ था।
  • जसवंत सिंह के मंत्री महेश दास थे।
  • जसवंत सिंह के घोड़े का नाम महबूब था।
  • जसवंत सिंह के दरबारी कवी मुहणोत नैणसी थे।
  • मुहणोत नैणसी ओसवाल जैन समुदाय से थे। ओसवालों की कुल देवी सच्चिया माता है। सच्चिया माता का मंदिर ओसिया में है। ओसिय का प्राचीन नाम उपकेश पट्टन था। ओसिय को राजस्थान का भुवनेश्वर कहा जाता है।
  • मुहणोत नैणसी ने नैणसी री ख्यात व मारवाड़ रे परगना री विगत (राजस्थान का गजेटियर) ग्रन्थ लिखे है।
  • नैणसी री ख्यात में “हैं” शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है।
  • मारवाड़ रे परगना री विगत ग्रन्थ मारवाड़ी भाषा में लिखा गया है।
  • मुहणोत नैणसी की हत्या जसवंत सिंह के पुत्र अजीत सिंह ने करवाई थी।
  • मुंशी देवी प्रसाद ने मुहणोत नैणसी को राजपूताने का अबुल फ़जल कहा है। (अबुल फ़जल अकबर के नौ रत्नों में से थे। (अकबर के पुत्र जहांगीर व ओरछा के सरदार वीरसिंह बुंदेला ने अबुल फ़जल की हत्या कर दी थी।)
  • जसवंत सिंह के सेवक आसकरण राठौर थे। आसकरण राठौर का पुत्र वीर दुर्गादास राठौर थे।
  • वीर दुर्गादास राठौर के पिता आसकरण थे व माता नेतकवर थी।
  • वीर दुर्गादास राठौर का जन्म सालवा गाँव में हुआ था।
  • वीर दुर्गादास राठौर को मारवाड़ का उदारक, मारवाड़ का अण बिंदिया मोती,  मारवाड़ का गैरीबाल्डी कहा जाता है।
  • वीर दुर्गादास राठौर को को कर्नल जेम्स टॉड ने राठौरों का यूलिसेस कहा है।
  • वीर दुर्गादास राठौर की छतरी उज्जैन (मध्य प्रदेश) में है।
  • जसवंत सिंह को सर्वप्रथम मालवा का सुबेदार बनाया गया था।
  • शाहजहाँ अपने पुत्र दारा शिकोब को राजा बनाना चाहता था परन्तु औरंगज़ेब शासक बनाना चाहता था।
  • 15 अप्रैल, 1658 को धरमत का युद्ध शिप्रा नदी किनारे उज्जैन (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इस युद्ध में दारा शिकोह के साथ जसवंत सिंह व कासिम खां था।
  • कासिम खां ने दारा शिकोह को धोखा दे औरंगज़ेब के साथ चला गया था।
  • इस युद्ध को तलवारों व बारूदों का युद्ध भी कहा जाता है।
  • इस युद्ध में औरंगज़ेब विजियी हुआ था। इस युद्ध के बाद धरमत का नाम बदलकर फतेहाबाद कर दिया था।
  • धरमत का युद्ध हार जाने के बाद जसवंत की पत्नी जसवंत दे हाड़ी रानी दरवाजे नहीं खोलती है, वह कहती है या तो मेरा पति युद्ध में विजयी होके आयेंगे या फिर वीरगति को प्राप्त हुंगे।
  • 14 मार्च 1659 को औरंगजेब व दारा शिकोह के मध्य दौराई का युद्ध अजमेर हुआ था। इस युद्ध में भी जसवंत सिंह दारा शिकोह की सहायता करते है।
  • इस युद्ध में भी दारा शिकोह पराजित हो जाता है।
  • दारा शिकोह तारागढ़ दुर्ग (अजमेर)  में छिपा हुआ था।
  • औरंगज़ेब ने दारा शिकोह को कंकवाड़ी दुर्ग (अलवर ) में कैद किया था।
  • जसवंत सिंह ने जोधपुर में अनार के बाग़ लगाये थे। अनार के वृक्ष काबुल से लाये गये थे।
  • जसवंत सिंह ने भाषा भुसण , आनंदविलास , प्रबोधचन्द्रोदय ग्रन्थ लिखे थे।
  • 1678 में जामरूद अभियान के दौरान जसवंत सिंह की मृत्यु हो जाती है।
  • जसवंत सिंह की मृत्यु के पश्चात औरंगज़ेब ने कहा था “कुफ्र का दरवाजा टूटा” (कुफ्र का अर्थ धर्म विरोधी होता है)।
  • जसवंत की मृत्यु के बाद जसवंत सिंह की पत्नी को कैद कर दिल्ली ले जाता है। दिल्ली में जसवंत सिंह की पत्नी को रूपसिंह हवेली में रखा गया था।

अजीत सिंह (1699- 1724) – 

  • अजीत सिंह का जन्म 1679 को लाहौर में हुआ था।
  • अजीत सिंह का पालन-पोषण गोराधाय द्वारा किया गया था।
  • गोराराम का मारवाड़ में घूंसा नामक गीत गूंजा था।
  • मेवाड़ के महाराणा राज सिंह द्वारा अजीत सिंह को सहायता व केलवा की जागीर दी जाती है।
  • अजीत सिंह को जयदेव ब्राह्मण की सहायता से कालिंदी गाँव (सिरोही) पहुचाया जाता है।
  • अजीत सिंह की रक्षा दुर्गादत्त राठौर करते है। अजीत सिंह दुर्गादत्त राठौर को ही देश दे देते है।
  • अजीत सिंह को इतिहासकरों ने कान का कच्चा कहा है।
  • अजीत सिंह ने मुहणोत नैणसी की हत्या करवायी थी।
  • जगजीवन भट्ट ने अजीत सिंह के उप्पर ग्रन्थ लिखा था जिसका नाम अजीतोदय था।
  • 1707 में अजीत सिंह के समय देबारी समझौता हुआ था। (देबारी समझौता में अजीतसिंह को मारवाड़, सवाई जयसिंह को आमेर का शासक बनाना व अमरसिंह द्वितीय की पत्री चंद्रकुँवरी का विवाह सवाई जयसिंह से करने व इनसे उत्पन्न संतान को आमेर का उत्तराधिकारी घोषित करने पर सहमति हुई।)
  • अजीत सिंह की पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह 1715 में फर्रुखशियर के साथ हुआ था। यह विवाह अंतिम राजपूत मुगल विवाह था।
  • अजीत सिंह की हत्या बख्तसिंह ने की थी। बख्तसिंह को मारवाड़ का दूसरा पितृहन्ता शासक कहा जाता है।

अभय सिंह (1724 – 1749) – 

  • 12 सितंबर 1730 को अभय सिंह के समय खेजड़ली की घटना हुई थी।
  • अभय सिंह ने खेजड़ली के आन्दोलन में गिरधरदास को भेजा था।
  • खेजड़ली आन्दोलन में अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने हरे वृक्षों को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया था। बिश्नोई समुदाय में इस बलिदान को साका/खड़ाना कहा जाता है। इन 363 लोगों में से 69 महिलाएं व 294 पुरुष थे।
  • 12 सितम्बर को खेजड़ली दिवस मनाया जाता है।
  • तेजादशमी को खेजड़ली मेला लगता है।
  • खेजड़ली वृक्ष की पूजा आश्विन शुक्लदशमी (विजयादशमी के दिन) की जाती है।

विजय सिंह – 

  • विजय सिंह ने अपने नाम पर विजयशाही सिक्के जोधपुर (मारवाड़) में चलाये थे।
  • विजयसिंह का विवाह गुलाब राय से हुआ था।
  • गुलाबराय को वीर विनोद के लेखक श्यामलदास ने मारवाड़ की नूरजहाँ कहा है।

भीम सिंह – 

  • 1807 में भीम सिंह की मृत्यु हो जाती है।

मान सिंह –

  • मान सिंह के लिए देव आयसनाथ ने भविष्यवाणी की थी की अगले शासक आप ही हुंगे।
  • मान सिंह नाथ समुदाय के अनुयायी थे।
  • मान सिंह ने जोधपुर में महा मंदिर बनवाया था। महा मंदिर नाथ समुदाय का प्रमुख केंद्र है।
  • मान सिंह के समय 1807 में कृष्णा कुवरी को लेके गिन्गोली का युद्ध परबतसर (नागौर) में हुआ था। कृष्णा कुवरी  मेवाड़ के शासक राजा भीमसिंह की पुत्री थी।
  • कृष्णा कुवरी की अमीर खां पिण्डारी द्वारा जहर देकर हत्या  कर दी गयी थी। अमीर खां पिण्डारी टोंक के संथापक था।
  • 1818 में  मान सिंह ने अंग्रेजों के साथ संधि की थी।
  • मान सिंह ने मानप्रकाश पुस्तकालय जोधपुर में बनवाया था।

तख़्त सिंह –

  • 1857 की क्रांति के समय जोधपुर के शासक थे।
  • 8 सितम्बर 1857 के बिथौड़ा युद्ध में तख़्त सिंह के सेनापति ओनाड़ सिंह की मृत्यु हो गयी थी।

जसवंत सिंह II –

  • जसवंत सिंह II के समत दयानंद सरस्वती जोधपुर आये थे।
  • जसवंत सिंह II के दरबार की नन्ही भगतन (नन्ही जान) ने 30अक्टूबर 1883 को अजमेर में दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया था।

सरदार सिंह –

  • सरदार सिंह ने अपने पिता जसवंत सिंह II की याद में जसवंतथड़ा का निर्माण करवाया था। जसवंतथड़ा को राजस्थान का ताजमहल या मारवाड़ का ताजमहल कहा जाता है।
  • सरदार सिंह के देहांत के बाद राजतिलक की परम्परा समाप्त हो गयी थी।

हनुमंत सिंह –

  • हनुमंत सिंह मारवाड़ के अंतिम शासक थे।
  • हनुमंत सिंह एकीकरण के समय जोधपुर के शासक थे।
  • हनुमंत सिंह  अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे।

Note – 

  • मारवाड़ का भागीरथ जगसिंह II को कहा जाता है।
  • आधुनिक मारवाड़ का निर्माता उम्मेद सिंह को कहा जाता है। उम्मेद सिंह को मारवाड़ का शाहजहाँ भी कहा जाता है। उम्मेद सिंह ने उम्मेद भवन बनाया था। जिसे छीतर पैलेस भी कहते है।
  • सरप्रताप ने कायलाना झील का निर्माण करवाया था।
  • सरप्रताप महारानी विक्टोरिया स्वर्ण जुबली प्रोग्राम में शामिल होने गये थे।

 

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