राजस्थान का इतिहास (भाटी वंश)

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राजस्थान का इतिहास (भाटी वंश) 


History of Rajasthan (Bhati Dynasty)


जैसलमेर का भाटी राजवंश स्वयं को श्रीकृष्ण व चंद्रमुखी यादव के वंशज मानते है।  भाटी राजवंश की कुलदेवी स्वांगिया माता है।स्वांगियां माता जिसे आवड़ माता के नाम से भी जाना जाता है। भाटी राजवंश के कुल देवता लक्ष्मीनारायण है। माना जाता है की जैसलमेर के शासकों की उत्पत्ति  चन्द्रवंशीय यदुवंशी की भाटी शाखा से हुई थी।

जैसलमेर के  शासकों के लिए  महारावल की उपाधि लगती है। जैसलमेर का प्राचीन नाम घटियाला शिलालेख के अनुसार मांड प्रदेश था।जैसलमेर के भाटी राजवंश के शासकों का उल्लेख लोद्रवा शिलालेख में मिलता है। यह शिलालेख 1157 ई. में मिला था।

जैसलमेर के भाटी वंश की स्थापना  भाटी (भट्‌टी) ने की थी।285 ई. में भट्‌टी ने भटनेर नगर बसाया था। भटनेर को भट्‌टी ने अपनी राजधानी बनया था। भट्‌टी  के पुत्र भूपत भाटी ने भट्‌टी के कार्यकाल में ही भटनेर दुर्ग का निर्माण कराया था। यह भटनेर दुर्ग हनुमान गढ़ में है। ( इसी दुर्ग पर तैमूरलंग का आक्रमण हुआ था। )

जैसलमेर के भाटी राजवंश का मूल स्थान ‘पंजाब’ था । भाटी राजवंश  की पहली राजधानी भटनेर,दूसरी राजधानी तन्नोट, तीसरी राजधानी लोद्रवा और चौथी व अंतिम राजधानी जैसलमेर को बनाया था।


भाटी राजवंश के प्रमुख शासक


Major Rulers of Bhati Dynasty


मंगलराव भाटी (Mangalrao Bhati) – 

  • भट्टी के पश्चात उनके पुत्र मंगलराव भटनेर के शासक बने थे।
  • गजनी के शासक ढुण्ढी और मंगलराव के मध्य एक युद्ध हुआ, उस युद्ध में मंगलराव को पराजय का सामना करना था।
  • युद्ध में पराजित होने के बाद मंगलराव भाटी तन्नौट क्षेत्र में चले गये व  मंगलराव भाटी ने ‘ तन्नौट ‘ को  भाटी वंश की दूसरी राजधानी बनाया था।

देवराज भाटी (Devraj Bhati) – 

  • देवराज भाटी ने लोद्रवा के पंवार शासकों को पराजित कर हारे हुए क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया था।
  • देवराज भाटी जीतने के बाद  तन्नौट से अपनी राजधानी बदलकर लोद्रवा को अपनी राजधानी बनाया था।
  • देवराज ने स्वयं को महरावल की उपाधि दी थी।
  • चन्ना राजपूतों  द्वारा 60 वर्ष को उम्र में देवराज को धोखे से मार दिया गया था।

राव जैसल (Rao Jaisal)  – 

  • लोद्रवा अपनी वर्तमान राजधानी को असुरक्षित मानते हुए राव जैसल ने लोद्रवा से 10 मील दूर 1155 ई. में जैसलमेर नगर बसाया था और जैसलमेर को अपनी राजधानी बनाया था।
  • 12 जुलाई , 1155 ई. जैसलदेव भाटी ने जैसलमेर दुर्ग  की नींव राखी थी। जैसलमेर दुर्ग  को पूरा राव  जैसल के पुत्र शालिवाहन द्वितीय ने पूरा कराया था। इस जैसलमेर दुर्ग को बनने में 7 साल  का समय लगा था।
  • जैसलमेर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाता है।

विजयराज चुडाला (Vijayraj Chudala) – 

  • विजयराज चुडाला का कार्यकाल 1165 ई. में माना गया है।

Note – [विजयराज चुडाला के शासन काल में सिंध (वर्तामान में पकिस्तान का क्षेत्र) के मुसलमान बार-बार आक्रमण कर रहे थे। इस समय विजयराज चुडाला तन्नौट के शासक थे। बार-बार आक्रमण होने से  विजयराज चुडाला की सेना काफ़ी कमजोर पड़ गयी थी। विजयराज चुडाला “तन्नौट माता” के बहुत बड़े भक्त थे।

विजयराज चुडाला “तन्नौट माता” के दरबार में गए और यह मन्नत मांगी की यदि कल होने वाले सिंध के मुसलमानों के साथ युद्ध में मैं विजयी रहा तो अपना शीश आपको अर्पण कर दूँगा।  दुसरे दिन हुए युद्ध में विजयराज चुडाला विजयी रहे।

युद्ध जितने के बाद विजयराज चुडाला अपना शीश माता को अर्पित करने गये थे तभी तन्नौट माता ने विजयराज चुडाला को दर्शन दिए और  बोली विजयराज मैं तेरी भक्ति से खुश हूँ, तुझे शीश अर्पित करने की कोई जरुरत नहीं है।

उसी समय विजयराज भाटी को तन्नौट माता ने एक चुडा (कंगन) भेंट किया और कहा इस चुडे को पहनने के बाद अमर रहोगे। मान्यता है की इसी के कारण विजयराज भाटी को इतिहास में विजयराज चुडाला नाम से जाना जाता है।]

जेत्रसिंह (Jetrasingh) – 

  • जेत्रसिंह 1275 ई. में जैसलमेर के राजा बने थे। जेत्रसिंह के समय दिल्ली में बलबन का साम्राज्य था।
  • 1308 ई. जेत्रसिंह के शासनकाल में दिल्ली में मुग़ल शासक अलाउद्दीन खिलजी था। अलाउद्दीन खिलजी ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में आक्रमण के लिए सेना भेजी लेकिन इसे सफलता प्राप्त नहीं हुई थी।
  • इसके पश्चात फिर अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफ़ूर के नेतृत्व में जैसलमेर दुर्ग पर अधिकार के लिए सेना भेजी लेकिन यह भी अधिकार नहीं कर पाया।
  • 1311 ई. अलाउद्दीन खिलजी ने पुन: कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सेना भेजी इस समय जैतसिंह का देहांत हो गया था।

मूलराज प्रथम (Mulraj I) – 

  • जेत्रसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके बड़े पुत्र मूलराज प्रथम जैसलमेर के शासक बने थे।
  • जैसलमेर दुर्ग में रसद सामग्री की कमी पड़ जाने के कारण मूलराज प्रथम ने दुर्ग के द्वार खोल दिये थे।
  • जैसलमेर दुर्ग में पहला साका 1312 – 1313 ई. में कराया गया था। इस साके में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था।
  • मूलराज व रतन सिंह  के नेतृत्व में युद्ध हुआ और मूलराज अपने वीर सैनिकों के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए तथा वीरांगनाओं ने जौहर किया था।
  • इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जैसलमेर दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया था।

राव घड़सी (Rao Ghadasi) – 

  • राव घड़सी राव मूलराज के भाई रतनसिंह का पुत्र था।
  • 1343 ई. के आसपास राव घड़सी ने  जैसलमेर दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया था।
  • जैसलमेर के निकट घड़सीसर तालाब राव घड़सी सिंह ने ही बनवाया था।
  • राव घड़सी की मृत्यु 1366 ई. में हुई थी।

राव दूदा (Rao Duda) – 

  • राव दूदा ने जैसलमेर दुर्ग पर अपना अधिकार किया था।
  • राव दूदा के समय दिल्ली में  तुगलक वंश का अधिकार हो गया था।
  • दिल्ली सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने राव दूदा के समय जैसलमेर पर आक्रमण कर दुर्ग को घेर लिया था।
  • राव दूदा व नेता जसवंत सिंह के  नेतृत्व में युद्ध हुआ राव दूदा व अन्य भाटी सरदार युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए तथा वीरांगनाओं ने जौहर किया था।
  • 14वीं शताब्दी के अंत में लगभग 1370-71 ई. में जैसलमेर दुर्ग का दूसरा साका हुआ था।
  • 1371 ई. में दूदा की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र केहर तृतीय जैसलमेर का शासक बना था।

राव लक्ष्मण सिंह (Rao Laxman Singh)  – 

  • जैसलमेर दुर्ग में  राव लक्ष्मणसिंह ने  प्रभु लक्ष्मीनाथ (विष्णु) का मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • प्रभु लक्ष्मीनाथ को मुख्य शासक मानकर राव लक्ष्मणसिंह ने  स्वयं को उनका प्रतिनिधि मानकर शासन किया था।

राव बैरसिंह (Rao Bairsingh) – 

  • 1441 ई. में  राव बैरसिंह ने रत्नेश्वर महादेव का भव्य मंदिर बनवाया था।
  • मान्यता है की राव रणमल की चित्तौड़ में हत्या होने के पश्चात राव जोधा को राव बैरसिंह ने अपने राज्य में शरण दी थी।

राव जैतसिंह II (Rao Jait Singh II) –

  • रावल जैतसिंह II ने शांतिनाथ जैन मंदिर का निर्माण करवाया था।

राव लूणकरण (Rao Lunkaran1528-1550 ई.) – 

  • 1528 ई. राव जैतसिंह द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसका छोटा पुत्र लूणकरण जैसलमेर का शासक बना था।
  • राव लूणकरण की तीन पुत्रियाँ व नौ पुत्र थे। राव लूणकरण की बड़ी पुत्री रामकुँवरी व छोटी पुत्री उमादे का विवाह जोधपुर के महाराजा मालदेव के साथ हुआ था। राव लूणकरण की मजली पुत्री का विवाह उदयपुर के महाराणा उदयसिंह के साथ हुआ था।
  • राव लूणकरण की छोटी पुत्री उमादे इतिहास में ‘रूठी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध है।
  • राव लूणकरण ने  अपने पिता के काल में ‘जेतबंध यज्ञ’ का आयोजन कराया था, इस यज्ञ में उन भाटियों को बुलाया गया था जिन्होंने सिंध में जाकर धर्म परिवर्तन कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था।
  • इस यज्ञ से उन्हें पुनः हिन्दू धर्म मे परिवर्तित कर घर वापिसी करायी थी।
  • इतिहास में शुद्धिकरण की दिशा में यह पहली घटना थी।
  • राव लूणकरण ने कंधार के अमीर अली खाँ को  शरण दी थी परन्तु अमीर अली खाँ  ने अचानक दुर्ग पर आक्रमण कर दिया था।
  • इस आक्रमण में राव लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुए थे।
  • राव लूणकरण की मृत्यु के बाद इनके पुत्र मालदेव ने अमीर अली खाँ की हत्या कर यह युद्ध जीत लिया था।
  • युद्ध जितने के कारण यहाँ पर जौहर नहीं हुआ था। इसी कारण से इसे अर्द्धसाका कहा गया है।
  • यह अर्द्धसाका 1550 ई. में हुआ था।

राव हरराज (Rao Harraj 1561-1577 ई.) – 

  • राव लूणकरण के पुत्र राव मालदेव के पश्चात राव हरराज शासक बना था।
  • राव हरराज जैसलमेर का पहला शासक था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकारी व मुगलों के साथ के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे।
  • राव हरराज  ने जयपुर के राजा भारमल के कहने पर  नवंबर 1570 ई. मे हुए नागौर दरबार में उपस्थित होकर मुग़ल शासक अकबर की अधीनता स्वीकार की थी तथा अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर के साथ किया  था।
  • राव हरराज मुगलों की अधीनता स्वीकार कर अपने पुत्र सुल्तानसिंह को अकबर की शरण में छोड़ दिया था।
  • राव हरराज की एक और पुत्री थी चंपादे उस चंपादे का विवाह राव हरराज ने अकबर के दरबारी विद्वान पृथ्वीराज राठौर (बीकानेर के) के साथ किया था।
  • राव हरराज ने अपने राज्य में  सामंत प्रणाली को लागू किया था।
  • राव हरराज के शासनकाल में कुशललाभ ने ‘पिंगल शिरोमणि’नामक ग्रंथ की रचना की थी।

राव भीम (Rao Bhim 1577-1613 ई.) – 

  • राव हरराज के पश्चात उनका पुत्र राव भीम जैसलमेर की गद्दी पर बैठा था।
  • राव भीम के नाबालिक होने के कारण  शासन कार्य इनके भाई खेतसिंह ने संभाला था।
  • राव भीम ने जैसलमेर दुर्ग के द्वार पर गणेश पोल तथा सूर्यपोल का निर्माण करवाया था।
  • राव भीम की पत्नी ने घड़सीसर तालाब के किनारे नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • भीमसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह सलीम ( जहाँगीर) से किया था।
  • जहाँगीर के बादशाह बनने के बाद  इस बेगम का नाम ‘मलिका-ए-जहाँ’ रखा गया था।
  • तुजुक-ए-जहाँगीरी में रावल भीम का उल्लेख मिलता है।
  • राव भीम ने मुगलों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किये थे।

महारावल कल्याण (Maharawal Kalyan 1613-1627 ई.) – 

  • रावल कल्याण  की उपाधि जैसलमेर में स्थित सेठ थारूशाह के देरासर में स्थित स्तंभ लेख में ‘महारावल’ की मिली है।
  • ‘महारावल’ की उपाधि का जैसलमेर के शासकों के लिए प्रयोग का यह प्रथम साक्ष्य है।

महारावल मनोहरदास (Maharawal Manohardas1627-1650 ई.) – 

  • महारावल मनोहरदास ने जैसलमेर दुर्ग की 99 बुर्जों से युक्त प्राचीर का अंतिम रूप से निर्माण करवाया था।

महारावल सबल सिंह (Maharawal Sabal Singh 1650-1660 ई.) – 

  • 1659 ई. में महारावल सबल सिंह द्वारा जैसलमेर राज्य में तांबे की मुद्रा ‘डोडिया’ का प्रचलन किया गया था।

महारावल अमरसिंह ( Maharawal Amar Singh1660-1701 ई.) – 

  • अमर सिंह औरंगजेब के समकालीन का राजा था।
  • अमर सिंह ने अमरसागर झील बनवाई थी।
  • अमर सिंह ने एक अमरकास नाला बनवाया था। इस अमरकास नाले की सहायता से ये सिन्धु नदी के पानी को राजस्थान में लाये थे।

महारावल अखैसिंह (Maharawal Akhai Singh 1722-1761 ई.) – 

  • महारावल सवाईसिंह के पश्चात अखैसिंह जैसलमेर के शासक बने थे।
  • अपने शासनकाल में अखैसिंह ने जैसलमेर दुर्ग में रणछोड़ जी के मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण करवाया था।
  • महारावल अखैसिंह ने दुर्ग में ‘अखैविलास’ महल का निर्माण करवाया था।
  • महारावल अखैसिंह ने जैसलमेर 1756 ई. में स्वतंत्र टकसाल की स्थापना की थी।
  • महारावल अखैसिंह के समय ढाले गए सिक्कों को मुहम्मदशाही तथा अखैशाही कहा गया था।

महारावल मूलराज II (Maharawal Mulraj II 1761-1819 ई.) – 

  • मूलराज II का विवाह किशनगढ़ की राजकुमारी रूपकंवर से हुआ था। रूपकंवर  वैष्णव धर्म के वल्लभ सम्प्रदाय की अनुयायी थी।
  • मुलराज II का भी वैष्णव धर्म की ओर रूझान बड़ा तथा मूलराज II के शासनकाल में ही पुष्टिमार्गीय वैष्णव धर्म राज्य का राजधर्म बना था।
  • 1779 ई. में मूलराज- II ने राजपरिवार सहित नाथद्वारा की यात्रा की थी।
  • मूलराज II के समय ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ संधि हुई थी।
  • मूलराज II के दरबार में दीवान सालमसिंह के अत्याचारों से परेशान होकर इसने 12 दिसम्बर 1818 को दौलत सिंह और मोती राम को चाल्स मेटको के पास संधि करने को भेजा था।
  • इस संधि को जनवरी 1819 में मंजूरी मिल गयी थी।
  • मूलराज II के शासनकाल में ‘मूलनिवास’ तथा ‘लक्ष्मी कीर्ति संवाद’ आदि ग्रंथों की रचना की गई थी।

महारावल गजसिंह ( Maharawal Gaj Singh 1820-1846 ई.) – 

  • 1820 ई. में महारावल गजसिंह का राज्याभिषेक हुआ था।
  • महारावल गजसिंह के शासनकाल में 1829 में बासणपीर के युद्ध में जैसलमेर की सेना ने बीकानेर की सेना को पराजित किया था।
  • महारावल गजसिंह ने अपने समय में  जैसलमेर दुर्ग में ‘गजविलास’ तथा ‘सर्वोत्तम विलास’महलों का निर्माण करवाया था।

महारावल रणजीतसिंह  ( Maharawal Ranjit Singh 1846-1864 ई.) – 

  • महारावल रणजीतसिंह की अवयस्कता हेतु ठाकुर केसरीसिंह को इनका संरक्षक नियुक्त किया गया था।
  • 1857 की क्रांति के समय रणजीत सिंह जैसलमेर के शासक थे।
  • 1857 की क्रांति के समय रणजीत सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया था।
  • रणजीत सिंह के शासनकाल में जैसलमेर की पाषाण शिल्प कला को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी।
  • 1857 ई. रणजीत सिंह के शासनकाल में ही जोधपुर से जैसलमेर होते हुए सिंध तक डाक मार्ग की स्थापना हुई थी।
  • रणजीत सिंह के शासनकाल में चांदी के सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया का नाम अंकित किया गया था।
  • रणजीत सिंह ने  विक्रम संवत को राजकीय संवत घोषित किया था।
  • रणजीत सिंह के शासनकाल में गोकुलनाथ भट्‌ट ने ‘रणजीत रत्नमाला’ग्रंथ की रचना की।
  • रणजीत सिंह के शासनकाल में  मेहता अजीत सिंह ने जैसलमेर राज्यरी ख्यात लिखी थी।

महारावल बैरीशाल ( Maharawal Barishal 1864-1891 ई.) – 

  • महारावल बैरीशाल के शासकाल में  सौराष्ट्र के मेहता जगजीवन को दीवान नियुक्त किया गया था।
  • जैसलमेर के इतिहास में प्रथम बार राज्य के बाहर के किसी व्यक्ति को दीवान नियुक्त किया गया था।
  • महारावल बैरीशाल के साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक समझौता कर लिया था।
  • इस  समझौता में ‘बाप’ नामक स्थान पर बनने वाले नमक के संबंध में राज्य के अधिकार को सीमित किया गया था।
  • महारावल बैरीशाल के शासकाल में  चांदी के ‘नजराना सिक्के’ढलवाये गए थे।
  • इन सिक्कों में एक ओर महारानी विक्टोरिया तथा दूसरी ओर महारावल बैरीशाल नाम अंकित करवाया गया था।
  • 1888 ई. में जैसलमेर में प्रथम ब्रिटिश डाकखाना की शुरुवात की गयी थी।
  • महारावल बैरीशाल ने रतनू शिवदान को अपना राजकीय कवि बनाया था तथा इनको ‘कविराजा’ की उपाधि दी थी।

महारावल शालिवाहन II (Maharawal Shalivahan II 1891-1915 ई.) – 

  • महारावल बैरीशाल  नि:संतान थे। महारावल बैरीशाल की मृत्यु के बाद इनके भाई कुशालसिंह के पुत्र श्यामसिंह को शालिवाहन II नाम से गद्दी पर बैठाया गया था।
  • महारावल शालिवाहन II का संरक्षक एवं शिक्षक हरविलास शारदा को नियुक्त किया गया था।
  • महारावल शालिवाहन II के शासन काल में ‘महकमा खास’ तथा ‘सेक्रेटेरियट’ नामक विभाग बनाए गए थे।
  • महारावल शालिवाहन II के शासन काल में जैसलमेर में अखिल भारतीय श्वेताम्बर जैन महासभा का आयोजन हुआ था।

महारावल जवाहर सिंह (Maharawal Jawahar Singh 1914-1949 ई.) – 

  • शालिवाहन II नि:संतान थे। शालिवाहन II की मृत्यु के बाद  ठाकुर सरदारसिंह के पुत्र जवाहरसिंह को गद्दी पर बैठाया गया था।
  • महारावल जवाहर सिंह ने  प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की आर्थिक सहायता की थी। जिसमें महारावल जवाहर सिंह ने 10 लाख रुपये दिए थे।
  • विश्वयुद्ध समाप्त होने के पश्चात वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड स्वयं आभार व्यक्त करने जैसलमेर आये थे।
  • जवाहर सिंह को  जैसलमेर  का आधुनिक निर्माता कहते है।
  • जवाहर सिंह के काल में नगर पालिका की शुरुवात हुई थी।
  • जवाहर सिंह ने अपने शासनकाल में राज्य में पशुओं की पीठ पर दागने की प्रथा शुरू की थी।
  • 1939 में जवाहर सिंह ने राज्य में प्रथम बिजली घर की स्थापना करवाई थी।
  • जवाहर सिंह ने राजस्थान के अंतिम दुर्ग ‘मोहनगढ़’ का निर्माण करवाया था।
  • जवाहर सिंह के समय में जवाहर विलास महल बना था।
  • जवाहर सिंह के समय में 3 अप्रैल, 1946 ई. को तेल झिड़क कर स्वतन्त्रता सेनानी सागरमल गोपा को जेल में जिंदा जला दिया गया था। 4 अप्रैल, 1946 को उनकी मृत्यु हो गई थी।

महारावल गिरधरसिंह (Maharawal Girdhar Singh 1949-50) – 

  • महारावल गिरधरसिंह के समय में 30 मार्च, 1949 को जैसलमेर का राजस्थान में विलय कर दिया गया था।

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