छत्रपती शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj)

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  • मूल नाम – शिवाजी भोंसले
  • पिता  – शाहजी भोंसले
  • माता- जीजा बाई
  • राज्याभिषेक- ‎6 जून 1674
  • निधन- 5 अप्रैल 1680

सन् 1627 ईसवी में पूरे भारत पर मुगल साम्राज्य का आधिपत्य था ।उत्तर में शारजाह तो बीजापुर में सुल्तान आदिल शाह और गोलकुंडा में सुल्तान अब्दुल्लाह कुतुब शाह था। डेक्कन के सुल्तान सेना के लिए हमेशा मुस्लिम अफसरों को ही प्राथमिकता देते थे।बंदरगाहों पर पुर्तगालियों का कब्जा था, और थल मार्ग पर मुगलों का अधिकार। इसलिए उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया से मुसलमान अधिकारियों को ला पाना मुमकिन नहीं था।  डेक्कन के सुल्तानों को हिंदू अधिकारी नियुक्त करने पड़ते थे। आदिल शाह की सेना में एक मराठा सेनाध्यक्ष थे शाहजी भोंसले। शाहजी सेना में उच्च पद पर आसीन थे।

शिवाजी का जन्म-

सन्1630 में महाराष्ट्र में जुन्नर के समीप शिवनेरी के किले में उनके और जीजा बाई के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ। स्थानीय देवता शिवाय के नाम पर पुत्र का नामकरण हुआ जो आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से विश्व विख्यात हुए। शिवाजी के पिता काफी समय घर से दूर रहे थे। इसलिए बचपन में शिवाजी की देख-रेख माता जीजाबाई और गुरु दादो जी कोंणदेव ने की। दादो जी ने उन्हें युद्ध कौशल और नीति शास्त्र सिखाया तो जीजाबाई ने हिंदू धार्मिक कथाएं ।जब दादो जी का सन् 1647 में निधन हुआ तब उनका यह मानना था कि शिवाजी अपने पिता की तरह आदिल शाह की सेना में उच्च पद पर आसीन होंगे,लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था ।

 

सन् 1646 के समय भारत में किसी भी हिंदू शासक का अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर पाने के लिए इन तीन परिस्थितियों का पूरा होना जरूरी था,

1. वह शक्तिशाली साम्राज्य से केंद्र से दूर हो।

2. जमीन खेती के लिए अनुपयोगी हो।

3. जंगलों से गिरा हुआ ताकि छापामार युद्ध गोरिल्ला वार फेयर करा जा सके।

शिवाजी के साम्राज्य की  शुरुवात –

यह परिस्थितियां 1646 मैं शिवाजी के लिए अनुकूल बनी ।जब उन्होंने स्थानीय किसानों मावली के समर्थन से अपनी सेना का निर्माण किया। शिवाजी को भली भांति ज्ञात था, कि किसी भी साम्राज्य को स्थापित करने के लिए किलो की क्या महत्व है। इसलिए सिर्फ 15 साल की उम्र में ही उन्होंने आदिलशाही अधिकारियों को रिश्वत दे कर तोड़ना शुरू कर दिया था। जिसके चलते शिवाजी ने चकन, तोरणा,कोडन किलो को अपने अधिकार में कर लिया था। इसके बाद शिवाजी ने आभाजी सोंदेव की मदद से थाना, कल्याण और भिवंडी के किलो को मुल्ला अहमद से छीन कर अपने अधिकार में कर लिया। इन घटनाओं से आदिलशाही साम्राज्य में हड़कंप मच गया। शिवाजी को रोकने के लिए उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया।

शिवाजी की युद्ध रणनीति-

इसलिए शिवाजी ने अगले 7 साल तक आदिल शाह पर सीधा आक्रमण नहीं किया। शिवाजी ने यह समय अपनी सेना को बढ़ाने और प्रभावशाली देशमुखों को अपनी ओर करने में लगाया। धीरे- धीरे उन्होंने एक विशाल सेना खड़ी कर दी। जिसके घुड़सवार की कमान नेताजी पालकर ने संभाल रखी थी,और पैदल सेना की कमान यशाजी कंक ने संभाल रखी थी। अब तक शिवाजी के पास 40 किलो भी आ चुके थे। शिवाजी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सन् 1659 मैं बीजापुर की बड़ी साहिबा ने अफजल खान को 10,000 सिपाहियों के साथ शिवाजी पर आक्रमण करने का हुक्म दिया ।अफजल खान अपनी क्रूरता और ताकत के लिए जाना जाता था। उसने शिवाजी को खुले युद्ध करने के लिए उकसाने के लक्ष्य से बहुत सारे मंदिरों को तोड़ डाला और कई बेगुनाह नागरिकों को मार डाला।

लेकिन शिवाजी ने चतुराई और रण कौशल का परिचय देते हुए छापामार पद्धति से युद्ध चालू रखा। इस समय वह प्रतापगढ़ जिले में रहे जोकि चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ था। अंत में अफजल खान ने शिवाजी को धोखे से मारने की साजिश की उसने शिवाजी को मिलने का न्योता भेजा। जब शिवाजी और अफजल खान मिले तो अफजल खान ने अपनी मजबूत पकड़ में शिवाजी को दबाकर मार डालने का प्रयास किया लेकिन शिवाजी पहले से तैयार थे। अपने छुपा कर रखे गए बाघ नाका से शिवाजी ने अफजल खान का पेट चीर डाला। जो कि उनसे दोगुना विशालकाय था। इसके बाद प्रतापगढ़ की लड़ाई में शिवाजी ने अफजल खान की सेना को करारी मात दी। शक्तिशाली अफजल खान की हार से बीजापुर का सुल्तान स्तब्ध रह गया। अबकी बार रुस्तम जमान को भेजा गया ।28 दिसंबर 1659 को शिवाजी ने रुस्तम जमान की सेना पर सामने से हमला बोल दिया साथ ही उनकी सेना की दो और टुकड़ियों ने  दोनों दिशाओं से रुस्तम की फौज पर आक्रमण कर दिया । रुस्तम जमान शर्मिंदाजनक  स्थिति में लड़ाई के मैदान से अपनी जान बचाकर भाग गया।

सन्1660 में आदिल शाह ने अपने सेनापति सिद्दी जौहर को शिवाजी पर हमला करने के लिए भेजा। शिवाजी पन्हाला किले में थे और सिद्दी जौहर की सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया था। शिवाजी ने सिद्दी जौहर को मिलने का न्योता दिया और जब वह मिले आया तो आदिल शाह संदेशा भिजवा दिया की सिद्दी जौहर उनसे गद्दारी कर रहा है। इससे आदिलशाह और सिद्दी जौहर के बीच लड़ाई छिड़ गई। जिसका फायदा शिवाजी ने उठाया शिवाजी एक रात अपने 5,000 सिपाहियों के साथ पन्हाला किले से बाहर निकल आए। बाजी प्रभु देशपांडे ने सिपाहियों के साथ दुश्मन सेना को उल्जाये रखा।जिससे शिवाजी सकुशल विशालगढ़ पहुंच गए। लड़ाई में बाजी प्रभु देशपांडे को अपने प्राण से हाथ धोना पड़ा। उनको महाराष्ट्र के इतिहास में एक महान योद्धा माना जाता है।

इसके बाद बीजापुर की बड़ी बेगम ने औरंगजेब से शिवाजी को पकड़ने के लिए विनती करी । उसने अपने मामा शाइस्ता खान को 1,50,000 सैनिकों के साथ शिवाजी से युद्ध करने भेजा। शाइस्ता खान ने अपनी विशाल सेना के बल पर पुणे पर कब्जा कर लिया था। और शिवाजी के निवास स्थान लाल महल में अपना बसेरा डाल लिया।शिवाजी ने चालाकी से अपने 400 सिपाहियों के साथ शादी के बारातियों के वेश में पुणे में प्रवेश किया। रात के समय उन्होंने सीधे शाइस्ता खान के ऊपर खतरनाक हमला बोला। खान ने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई पर शिवाजी यह तलवार की वार से अपनी तीन उंगलियां गवा बैठा।उंगली तो गई और इज्जत भी। शिवाजी ने सन् 1664 में मुगल व्यवसाय केंद्र सूरत पर आक्रमण कर दिया और उसे तहस-नहस कर डाला। औरंगजेब आग बबूला होकर 60 वर्षीय राजपूत सेनानायक मिर्जा राजा जयसिंह को अपने डेढ़ लाख सैनिकों के साथ शिवाजी से लड़ने के लिए भेजा। इस युद्ध में शिवाजी की हार हुई। और अपने 23 किलो और चार लाख की मुद्रा हर्जाने के तौर पर देनी पड़ी । उन्हें अपने 9 वर्ष के पुत्र सम्भाजी के साथ आगरा जाना पड़ा।शिवाजी को नियंत्रित रखने के लिए पहले यह तय हुआ कि उन्हें मुगल दरबार में कोई पद दिया जाए लेकिन औरंगजेब ने उसको बदलकर शिवाजी को घर में कैद करने का आदेश दे दिया। औरंगजेब नहीं जानता था, कि यह गलती बहुत महंगी पड़ेगी।

शिवाजी ने बीमारी का बहाना बनाया और अपने स्वास्थ्य को ठीक करने के आशीर्वाद के लिए साधु संतों और फकीरों को रोजाना मिठाइयां और उपहार भेजने की इच्छा जताई ।एक दिन वह खुद श्रमिक के भेष में सामान के डब्बे में सम्भाजी को छुपाकर बाहर निकल आए। वह मथुरा,काशी,गया,पूरी के बाद गोलकुंडा और बीजापुर होते हुए रायगढ़ पहुंच गए ।1670 तक शिवाजी ने कई लड़ाइयां लड़ते हुए 4 महीनों के भीतर अपने राज्य का बड़ा हिस्सा मुगलों से स्वतंत्र करा लिया था।सन् 1671 से 1674 तक औरंगजेब ने भरसक प्रयास किया शिवाजी को अपने अधीन करने का लेकिन वो बुरी तरह से असफल हुआ। उसने अपने उत्तम योद्धाओं जैसे दाऊद खान और मोहब्बत खान को शिवाजी से लड़ने भेजा।लेकिन सबको हार का सामना करना पड़ा

शिवाजी का राज्याभिषेक –

इसके साथ ही 1672 में अली आदिलशाह की मृत्यु हो गई और बीजापुर सल्तनत की स्थिति में चला गयाआखिर वह दिन आया जब गगा भट्ट ने 6 जून 1674 को हिंदू परंपराओं के साथ शिवाजी का राज्याभिषेक किया।वह मराठा के राजा बने और कई सदियों के अंतराल के बाद हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार तिलक,जनेऊ और वेदों के उच्चारण के बीच किसी राजा का राज्याभिषेक संपन्न हुआ शिवाजी की महानता सिर्फ उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल में ही नहीं  थी वह एक योग्य प्रशासक भी थे उन्होंने धर्म के आधार पर कभी किसी के साथ  पक्षपात नहीं किया उनके कई अधिकारी यहां तक कि उनके व्यक्तिगत अंगरक्षक में कुछ मुसलमान भी थे उन्होंने कभी किसी भी नारी का निरादर नहीं किया यहां तक कि युद्ध में हारे हुए दुश्मनों की स्त्रियां को भी सम्मान सहित वापस भेज देते थे

गोरिल्ला युद्ध किलो का उपयोग और नौसेना का निर्माण भारत में पहली बार शिवाजी ने हीं करा उन्होंने 4 किलो तथा 2000 सैनिकों से शुरुआत की मृत्यु के समय तक यह गिनती 300 किलो एवं एक लाख सैनिकों की हो गयी थी

शिवाजी की मृत्यु-

मार्च 1680 में शिवाजी का स्वास्थ्य खराब हो गयातेज बुखार और पेचिश के चलते 5 अप्रैल 1680 को 52 साल की छोटी सी उम्र में शिवाजी का स्वर्गवास हो गया औरंगजेब ने सोचा शिवाजी की मृत्यु के बाद मराठा राज्य खत्म हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं पहले उनके पुत्र सम्भाजी ने और उसके बाद छत्रपति राजाराम ने मराठा शासन की बागडोर संभाली औरंगजेब को करीब 25 सालों तक मराठाओ के साथ युद्ध लड़ना पड़ा जिसकी वजह से वह अपनी मृत्यु के समय पूरी तरह से बर्बाद हो चुका था शिवाजी ने जो मराठा राज्य की नींव रखी वह आगे चलकर कर्नाटक से लेकर पाकिस्तान तक फैल गईथी